जब बाबासाहब अपनी आखिरी किताब लिख रहे थे - Baudh Young Organization

Post Top Ad

Post Top Ad

14 May 2017

जब बाबासाहब अपनी आखिरी किताब लिख रहे थे

यह उस समय का टॉपिक है जब बाबासाहब अपनी आखिरी किताब "बुद्ध और उनका धम्म" लिख रहे थे। उस समय वह बंगला न. 26, अलीपुर रोड, दिल्ली में रहते थे। एक शाम को भोजन करने के बाद वह 8 बजे के आसपास वो अपने एस्टडी रूम में दाख़िल हुए बैठे और कुछ लिखना शुरू कर दिया।
Baba-saheb-writing-last-book-in-hindi_14

उनके पर्सनल सहयोगी 'नानकचन्द रत्तू ' अपना कुछ जरूरी काम ख़त्म कर उनकी चेयर के पास खड़े हो गए और उनके आज्ञां की इंतज़ार करने लगे, कुछ समय बाद बाबासाहब ने ज़रा सी नज़रें ऊपर उठाई और रत्तू जी से कहा कि तुम जाकर सो जाओ, सुबह आ जाना। अपने बॉस का आज्ञां पाकर वो चले गए।

रोज़ के जैसे सुबह साधारणतया 8 बजे ही रत्तू बाबासाहब के पास आये। और को  देखते हैं, कि जिस पोज़िशन मे वो बाबासाहब के पास से गए थे बिलकुल उसी पोज़िशन में बाबासाहब अपनी चेयर पर बैठकर लिखने का काम कर रहे थे। उनको लिखते हुए लगभग 12 घण्टे हो गए थे। रत्तू जी चुपचाप उनकी चेयर के समकक्ष में खड़े हो गए।

उन्हें खड़े हुए काफी वक़्त हो गया था, परन्तु बाबासाहब ने अपनी नज़रे ऊपर उठाकर ही नही देखा। वो लिखने में इतने बिज़ी थे कि उन्हें किसी बात का ख्याल नही था। किसी तपस्वी की तपस्या में व्यवधान करना हर किसी के बस की बात नही होती। वो बाबासाहब की तपस्या ही थी। रत्तू जी, बाबासाहब का ध्यान अपनी ओर लाने के लिए टेबल पर मौजूद कुछ किताबो को उठाकर ठीक ढंग से रखने लगे।

तब बाबासाहब ने हल्की सी नज़रे उठाई और रत्तू जी से बोले - अरे रत्तू अभी तुम सोने नही गए। रत्तू जी उनके पैरोँ के करीब जाकर बैठ गए और आँखों में आंसू भरे हुए बोलने लगे - बाबा सुबह के साढ़े आठ बज चुके है। आपको बारह घण्टे हो गए है। आख़िरकार आप इतना परिश्रम किस लिए कर रहे हैं? बाबा साहब ने कहा - रत्तू हमारे समुदाय के लोग अभी बहुत पीछे है। मेरे लोगों को अभी भी भटके हुए है।

मेरे जिन्दा न रहने के बाद मेरी ये किताबे ही तो उनको सही मार्ग दिखाएंगी। अब मै तो पूरे देश में, सभी घरों में नही जा नहीं पाउँगा परन्तु मेरा लिटरेचर जरूर हर घर में पहुँच जायेगा। लोग मेरी सोच को समझ पाएंगे। मेरे थ्योरी, विचारधारा, फिलॉसपी और संस्कार मेरी किताबो में ही मिलेंगे। इसलिए मै इतनी मेहनत कर रहा हूँ। 

मेरे धम्म बंधुओं और मेरे समाज के लोगों से निवेदन है, आपस की लड़ाई छोड़िये, एक साथ जुड़ जाइये और धम्म कारवां आगे बढ़ने के लिए तैयार हो जाइये, बाबा साहब के मिशन को आगे ले जाने के लिए, क्योकि बाबा साहब बिना स्वार्थ के हम लोगों के लिए जब इतना त्याग कर सकते हैं। 

हमें कौन सा पहाड़ उठाना है बस उनके बताये हुए दिखाए हुए रस्ते पे पहले खुद चलिए और दूसरों को आगे बढ़ने में अपना योगदान देना है बाबा साहब तो नहीं रहे पर करोड़ों भीम के लाल को स्वर्ग जैसी जिंदगी देकर चले गए हम लोग उनके बताये हुए मार्ग पर अगर अकेले निकलते हैं तो निचित है हमारे साथ लाखों भीम के लाल साथ हो जायेंगे, हम कोशिश नहीं करते बस सोचते रहते हैं ।

1 comment:

Post Top Ad